"अगर तुम यह कहते हो की मैं शिवानंद का शिष्य हूँ, अगर तुम अपने को शिवयोगी कहते हो, तो उसके जैसी perfection ला कर दिखाओ| अपने यौवन में जब बाबाजी boxer थे तब उन्होंने जम के boxing करी| तब उन्होंने अपना धर्म निभाया, तब उन्होने यह नही कहा की भाई मैं तो प्यार का सागर हूँ, मैं कैसे किसी को आक्रमण कर सकता हूँ? उन्होने तब जो भी किया वो उनका धर्म था| और यही नहीं, जीवन के हर मोड़ पर उन्होने अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन किया| चाहे वह अपनी पत्नी से प्रेम करने की ही बात क्यों ना हो| जब गुरु माँ उनके जीवन में आईं, उन्होने यह नही कहा की मैं तो वैरागी हूँ, मैं तो परम ज्ञानी हूँ, मैं सिर्फ़ साधना करूँगा| उन्होने पलायन का मार्ग कभी नहीं चुना| तो तुम यह कैसे कह सकते हो की तुम्हे परिवार से भिन्न होना है? उन्होने स्वयं पारिवारिक माहौल में रह कर अपनी उन्नति करी ताकि कोई यह न कहे की परिवार त्याग कर ही स्वयं को जागृत करना संभव है| तुम सभी शिवयोग का बीड़ा उठाए हुए हो, तुम पर ज़िम्मेदारी है| एक शिष्य की पहचान गुरु से तो है ही है किंतु एक गुरु का भी परिचय उसके शिष्य से है| शिवयोगी होने के नाते तुम बाबाजी का नेतृत्व करते हो|
एक शिवयोगी का परिचय यह है की वह
१) दिल का मज़बूत होता है|
२) मासूमियत और प्रेम की प्रतिमूर्ति होता है|
३) अपने सिद्धांतों का पक्का होता है|
४) चरित्र का पवित्र होता है|
५) साधना में तपस्वी होता है|
धर्म की आड़ में किसी को परेशान करना और धर्म के डंडे से परिवार से भिन्न होने की बात करना कदापि नहीं है शिवयोग| बाबाजी ने अपने हर संबंध का धर्म बखूबी निभाया - चाहे वह पिता का हो, चाहे वह एक पति का हो और, जैसा की तुम मुझसे बेहतर बताओगे, एक गुरु का|
और यह भी याद रखो की एक सिद्ध, एक अवधूत मार्गदर्शन करने हेतु जन्म लेता है, अपनी पूजा करवाने के लिए नहीं| और तुम भी बाबाजी की जीवन शैली से सीखना| नहीं तो तुम भी वही करोगे जो सारी दुनिया कर रही है - भगवान को मंदिरों में बंद करने की प्रथा मानो कारावास में डाल दिया हो| बाबाजी के जीवन से सीख लो| प्रेममय बनो, करुणामय बनो|
गुरु को साधारण जीव जानो| Judge मत करो की वह क्या कर रहा है, क्या खा रहा है, वह क्या पहन रहा है, कैसे वेश में है, क्या उसका बोलने का ढंग है| तुम केवल और केवल उसकी दी हुई सीखों को अपने भीतर अंतरसात करो| सिर्फ़ उससे मार्गदर्शन की प्रार्थना करो| उसके दिव्य सागर से कुछ ज्ञान अर्जन की कामना करना| गुरु को लक्ष्य के रूप में देखो, की मुझे ऐसा बनना है और यह कैसे होगा, हिमालय पर जाकर नहीं, किंतु अपने भीतर का हिमालय जागृत करो क्योंकि आज न वह हिमालय बचा है जिसका वर्णन शस्त्रों में है और न ही आज वह परिस्थतियाँ हैं जो की तुम्हे यह अवसर प्रदान करें की तुम जंगलों में रह कर भी जी लोगे| और मैं कहता हूँ ज़रूरत भी क्या है? जब तुम्हारा गुरु संसार में रह कर शिवानंद बना तो तुम्हे परिवार में रहना ही रहना है|
अपने मन में गुरु की एक काल्पनिक छवि मत बनाना नहीं तो भाव यही आएगा की यह अध्यात्मिक उन्नति और आत्म साक्षात्कार तो दूर दराज़ किसी दुनिया की बातें हैं और मुझसे नहीं होगा यह सब| सामान्य बनो| तुम्हारा गुरु भी एक साधारण जीव ही है| वह भी वैसे ही ख़ाता है, सोता है और नित्य क्रियाएं करता है| ऐसा नहीं है की यदि उसको भोजन करना होता है तो वह भगवान से प्रार्थना करने लगता है की यह भोजन अपने आप मेरे मुख में चले जाए| वह सारे वही कार्य करता है जो सब तुम सब करते हो| इसीलिए कहता हूँ की कर्मठ बनो, त्याग की बात इस समय मत करो| कुछ त्यागना ही है तो गुरु के चरणों में अपनी विकारों का त्याग करो|
सिद्ध मार्ग है ही सरलता का मार्ग| हँसने की बात है तो हँसो, खाने की बारी है तो खाओ, परिवार को प्रेम देने की बारी है तो उनसे प्रेम करो| साधारण बनो, सरल बनो| जिस समय जो उचित है और जो तुम्हारा उत्तर्दायित्व है, उसे निभाओ| खुश रहो और सहजता से अपनी अध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करो|
बच्चा बनने में अपना आनंद है, परम आनंद है| अब ऊँची पसंद और उँची सोच का मुखौटा मत पहनना| खुल के जीवन जीना| किसी भी भाव को संयम का रूप मत लेने देना| तुम्हारा गुरु बहुत सरल है| एक आम मनुष्य का जीवन जीकर सिद्धत्व को प्राप्त किया है उसने| तो क्या तुम्हें पलायन करने की आवश्यकता है?
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